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तमाम उठापटक के बाद आखिरकार शिवपुरी मंडी को मिल ही गया उचित धणी-धोरी..!!

तमाम उठापटक के बाद आखिरकार शिवपुरी मंडी को मिल ही गया उचित धणी-धोरी..!!

*तमाम उठापटक के बाद आखिरकार शिवपुरी मंडी को मिल ही गया उचित धणी-धोरी..!!* 
 *पर क्या शुक्ला जी भी बचा पाएंगे कर की चोरी, या मिला लेंगे मंडी माफिया से हाथ और निकालेंगे बिना गेटपास के जींसों की बोरी पे बोरी....* 
 *।।चर्चित समाचार एजेंसी।।* 
 *। शिवपुरी 21/02/2026।।* आखिरकार शिवपुरी की कृषि उपज मंडी पिपरसमा को उसका सही धनी-धोरी मिल ही गया, ऐसा वहां के कुछ कर्मचारियों का मानना है, कुछ फ़िलहाल कोमा में हैं तो कुछ मूक हैं।जब तक नए सचिव बालेश शुक्ला का मंडी शिवपुरी के आढ़तियों एवं व्यापारियों के प्रति व्यवहार, कर्मचारियों से काम लेने की दृढ़ इच्छा एवं अधिक से अधिक राजस्व इकट्ठा करने के संकल्प रूपी उनकी अपनी जिम्मेदारियों को बापरा नहीं जाता तब तक कुछ भी अच्छा कहना सही मायनों में उचित नहीं होगा।
बालेश शुक्ला जबलपुर, रीवा, सिहोरी, ग्वालियर, में उप संचालक, एवं सहायक संचालक के पदों पर आसीन रहे हैं। शिवपुरी से ठीक पहले मुरैना के बमोरकलां में जनाब की पोस्टिंग मंडी सचिव के रूप में रही है।
 *पहले के सचिवों ने मंडी को बना दिया था 💃डी जगह-जगह लग जाती थी बोली..* 
पूर्व के सचिव चाहे वह राठौड़ हों, आर पी सिंह हों,जादौन हों, विश्वनाथ सिंह हों या रामकुमार शर्मा ही हों, इन्होंने और इनकी टीम ने शिवपुरी उपज मंडी के राजस्व को बढ़ाने पर ध्यान न देते हुए खुद की व्यवस्थाओं में दिलचस्पी अधिक ली, नतीजा यह हुआ कि मंडी शिवपुरी का राजस्व कागजों में तो 200% तक रहा पर हक़ीक़त में शून्य से शून्य तक का सफ़र ही तय कर पाया। क्योंकि हर बार मंडी सचिवों ने मंडी की हुंडी को व्यापारियों के बिस्तर पर वैश्या💃 की भांति गिरवी रखकर ख़ुद लंबे समय के लिए बाज़ार में सैर सपाटे को निकल लिया करते थे। नतीजा, व्यापारियों ने अपने तरीके से न सिर्फ़ मंडी के राजस्व को रगड़ा बल्कि अपनों के मनोरंजन का साधन भी बनाया और इसके जिम्मेदार दलालों की तरह केवल दांत दिखाते नज़र आए।
 *विश्वनाथ के समय हुआ भयंकर फर्जीवाड़ा..* 
शिवपुरी मंडी सचिव विश्वनाथ सिंह के कार्यकाल में मंडी की स्थिति भयंकर भयानक रही, इन्होंने जो कांड किए उनकी अपनी फेहरिस्त इतनी लंबी है कि किसी वेश्यालय के सर्टिफाइड दलाल को भी अपनी नीचता की पराकाष्ठा पर शक जाहिर हो जाए एवं खुद को शैदाई की सूची से बाहर कर ले, हम इनके मोटे कांडों पर नज़र डालें, तो सबसे पहले आता है मंडी में व्यापारियों के लिए व्यापारिक भूखण्ड आवंटन जिसमें इन महाशय ने खुद तो फर्जीवाडा कर मंडी की इज़्ज़त को तार-तार किया ही अपितु मंडी के अन्य जिम्मेदारों को दलालों की भूमिका में खड़ाकर मंडी को मुजराघर बना नुमाइश में खड़ा कर दिया और लगवाई खुलकर बोली, लेकिन इस बात की ख़बर मंडी के हितैषियों (ज्यादातर वह लोग जो रबड़ी की इस दलाली में जीभ तक नहीं मार पाए और कुछ वह जो इस तरह की दलाली से अपने आप को दूर रखते हैं)  के द्वारा जानकारी "चर्चित" को दी और हमने वर्तमान कलेक्टर रवीन्द्र चौधरी के कानों तक हकीकत पहुंचाकर यह कार्रवाई रुकवाई, हालांकि तत्कालीन भारसाधाक अधिकारी की टेबिल पर भार पड़ चुका था जो हम जानते थे परंतु कलेक्टर शिवपुरी इससे अछूते थे शायद इसलिए भी ईमानदारी से कार्रवाई में आगे रहे।
दूसरा कारनामा यह किया कि इन्होंने मंडी को रोजाना वाली 💃डी के तमगे से मुक्ति दिलाकर एक मुश्त गिरवीं रख दिया, अब मंडी के रक्षक भी वही और भक्षक भी वही (व्यापारी,अड़तिया) नतीजा यह हुआ कि इस फार्मूले के नाम पर शहर भर के व्यापारियों से लाखों की उगाई हुई जिसकी चर्चा न सिर्फ़ शहर की उपज मंडी और उनके व्यापारियों में व्याप्त है बल्कि जिले के आस पास की मंडी और जिले के बाहर की मंडियों में भी सुनी जा सकती है।
तीसरा बड़ा घोटाला फार्म गेट ऐप के नाम से किया जिसमें यह पकड़े भी गए और सस्पेंशन की मार से मारे भी गए, (यह फार्म एप घोटाला क्या था जिनको नहीं मालूम उन्हें अगले समाचार के माध्यम से समझाएंगे) इस फार्म गेट ऐप घोटाले में लाखों का घोटाला हुआ और इसकी जांच भी हुई परन्तु हैरानी की बात यह रही कि इस घोटाले की जांच केवल फाइलों तक ही सीमित रह गई। न तो व्यापारियों से रिकवरी हुई और न ही तत्कालीन मंडी सचिव विश्वनाथ सिंह पर कोई ठोस कार्रवाई हुई बल्कि उनको एक नहीं दो -दो मंडी का प्रभार देकर ऊपर बैठे मंडी के सच्चे हितैषी और इन दलालों के आकाओं ने जता दिया कि दलाली करने के लिए अब आपको एक नहीं दो मंडी दी जा रही हैं जिन्हें तुम अपने हिसाब से 💃डी  बना सकते हो।
 *सीट के लिए हुई नूरा कुश्ती अंत में सिलेक्शन हुआ शुक्ला का..* 
यहां बताना लाजिमी होगा कि विश्वनाथ के बाद रामकुमार शर्मा को तीन मंडियों का चार्ज दिया गया था जिसे वह रो-गाकर जैसे कैसे चला रहे थे, ऐसा दृश्य कई बार उनके चेहरे पर दिखा भी और उन्होंने बयान भी किया था पर वास्तविकता में क्या था..?  *यह तो राम जाने रामकुमार जाने, हम तो यह जानते हैं कि इस तीन जगह के चार्ज को लेकर उसे ऑपरेट करने में कईयों की सुलग तो रही थी पर आग नहीं लगा पा रही थी फिर आया "भावन्तर" देने को नया मौका, राम जी चूके नहीं मारा धर के चौका...* 
 _फ़िर क्या था वो मारा पापड़ वाले को ,भावन्तर में MD ने सही भाव लगा दिया और हो गए सस्पेंड, ख़बर लगते ही कई उम्मीदवारों की बांछे खिल गई, कईयों को नई खुशी मिल गई,कुछ कर्मचारियों का इस दुख रूपी पहाड़ से पिता का देवलोकगमन हो गया तो कुछ की खुशी इतनी थी मन मदिरालय को गमन हो गया कुछ ऐसे करके मंडी के हितैषियों ने अपने मन की उत्सुकता को किया शांत..!!_ 
 *इधर रोज़ ऑर्डर बदल रहे, उधर रोज़ बोतले बदल रही थीं कभी खुशी में, तो कभी ग़म में..* 
रामकुमार शर्मा के बाद शिवपुरी मंडी का चार्ज शिवशंकर को मिला, भईया कतई भी देरी न करते हुए सारे व्यापारियों को बकलोली कर आए। *बोले साला मैं तो साहब बन गया, साहब बनके कैसा तन गया, माल करूंगा तुरंत रिलीज़ मंडी से जैसे ही तुम्हारा धन मेरे जेब में गया,* पर यह खुशी केवल दो दिन की ही थी, मंडी MD को शायद कुछ और ही मंजूर था या फ़िर कृषि मंत्री को कह लीजिए, जो बालेश शुक्ला के नाम का ऑर्डर निकालकर उसपर तटस्थ बने रहे, जैसे ही आर्डर आया, फिर दौड़े भोपाल, फिर मनोव्वल, लक्ष्मी के दर्शन वगैरह- वगैरह..। पर क्या है कि अब मामला पलट चुका था। अब बालेश को ही आना था सो वह आ गए, हालांकि इस कहानी में भी एक विनोद है जो इस पटकथा का मुख्य किरदार तो है पर है पर्दे के पीछे, परन्तु नाटक के डायरेक्टर को सब मालूम है कि कौन कलाकार.? किसके अभिनय को खा रहा है..? और किसको बचा रहा..!! विनोद करैरा मंडी के भ्रष्टाचारी कॉलेज के प्राध्यापक रहे हैं तो सर्व गुण सम्पन्न हैं वहीं अब मठाधीशों ने सोच लिया है कि शिवपुरी मंडी को कोई प्राचार्य नहीं चलाएगा, क्योंकि अब यह कॉलेज नहीं यूनिवर्सिटी है यहां पर भ्रष्टाचार के वैरियंट पर न सिर्फ़ शोध किया जाता है वरन् प्रोडक्ट डिजाइन भी किया जाता और कब कितने में कहां दिखाना और बेचना है..?? यह भी समझाया और सिखाया जाता है तो इसके लिए प्राध्यापक नहीं अब कुलपति चाहिए।
अब देखना यह है कि क्या कुलपति इस यूनिवर्सिटी को संभारते हैं..?? या उन्नत भ्रष्टाचार के लिए निखारते हैं..!! 
शेषभाग अगले एपिसोड में...
लेखक:- वीरेन्द्र "चर्चित"

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