शिवपुरी,दुर्गा की आड मे भैरो ने अपना डंडा चला दिया,जय हो कोतवाल की...
।। चर्चित समाचार एजेंसी।।
।।शिवपुरी 09/08/2026।। शिवपुरी शहर के पिछले 24 घंटे का मीडिया का सबसे चर्चित मामला आज शिवपुरी में दम से सुर्खियो मे बना है। सीधे शब्दो मे लिखें तो दुर्गा की आड कर भैरो ने अपना डंडा चला दिया। मानते है कि किसी पत्रकार द्वारा अभद्र या आपत्तिजनक टिप्पणी करना गलत है, तो निश्चित रूप से उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी अधिकारी द्वारा जवाबी कार्रवाई के नाम पर झूठा मुकदमा दर्ज करवाना या कानून का दुरुपयोग करना सामने आता है, तो यह उससे कहीं अधिक गंभीर विषय है..!!
कई बार ऐसे विवाद बातचीत, समझाइश या छोटी प्रशासनिक कार्रवाई से ही खत्म हो जाते हैं। फिर मामला इतना बड़ा क्यों बनाया जाता है..? क्या हर असहमति का जवाब मुकदमे से ही दिया जाना चाहिए..?
पत्रकार को भी अपनी सीमाओं का होना चाहिए़ ज्ञान..
पत्रकार को भी अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों का एहसास होना चाहिए। कलम की ताकत के साथ उसकी जवाबदेही भी जुड़ी होती है। किसी अधिकारी, नेता या आम नागरिक पर आरोप लगाने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना पत्रकार का दायित्व है। अभद्र भाषा, व्यक्तिगत टिप्पणी या बिना प्रमाण आरोप पत्रकारिता की गरिमा को कमजोर करते हैं।
लेकिन दूसरी तरफ सत्ता या प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति को भी यह समझना होगा कि "पद की ताकत कानून से ऊपर नहीं होती" । यदि किसी पत्रकार ने गलती की है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन कानून को व्यक्तिगत रंजिश निकालने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।
आज पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है। ऐसे समय में पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है"अपनी विश्वसनीयता बचाए रखना"।
पत्रकार के पास सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास और उसकी कलम है। वह यदि पत्रकारिता को समाजसेवा के बजाय निजी लाभ, दबाव या सौदेबाजी का माध्यम बना लेता है, तो सबसे पहले उसकी अपनी साख खत्म होती है।
याद रखिए....
नेता का भ्रष्टाचार सामने आए तो उसकी राजनीति शायद जारी रहे,
अधिकारी का भ्रष्टाचार सामने आए तो उसका पद शायद बना रहे,
लेकिन पत्रकार की बेईमानी सामने आ जाए तो उसकी सबसे बड़ी पूंजी "विश्वसनीयता" खत्म हो जाती है।
इसलिए पत्रकारिता को धंधा नहीं, जिम्मेदारी समझना होगा। समाज की गंदगी साफ करने का बीड़ा उठाने वाले को पहले अपनी कलम को साफ रखना होगा। वहीं अधिकारियों को भी यह याद रखना चाहिए कि आलोचना का जवाब कानून के दायरे में दिया जा सकता है, लेकिन कानून का इस्तेमाल किसी को डराने या दबाने के लिए नहीं होना चाहिए।
लोकतंत्र में पत्रकार और प्रशासन आमने-सामने के दुश्मन नहीं, बल्कि अलग-अलग भूमिकाओं में समाज के प्रहरी हैं। दोनों की मर्यादा बनी रहेगी, तभी जनता का भरोसा भी बना रहेगा।
क्या कहा बुद्धजीवी जनहितैषियों ने...
अब अंत मे बुद्धजीवी जनहितैषी बोले की बडा वही है जिसका दिल बडा हो, इस मामले में पद और कार्यक्षेत्र तो बडा हो सकता है परंतु दिल नही..!!
अगर कोतवाल अपना दिल बडा कर लेते और बीमार पत्रकार माफ कर देते तो शायद आज प्रत्येक मीडियाकर्मी के दिल मे अपना वास कर लेते...!!
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